मधुली आमा

रमेश पाण्डेय 

चारों तरफ खामोशी है। पर गांव अपनी जगह वहीं है जहां था। जाड़ों में गांव की दुकान उठने बैठने की खास जगह बन जाती है।

समय काटने कं लिये धूप सेकना भी एक काम होती ही है। गांव के वे जवान जो गेहूं की बुआई पूरी कर के आस पास के गांवों में मजदूरी करने चले जाते थे गांव में ही मायूसी को ओड़ कर घाम ताप रहे हैं। भाई इस साल काम करने क्यों नही गये का छोटा सा उत्तर उनके मुख से निकलता है कि काम है ही नही। नीति आयोग, जिला योजना या योजना आयोग क्या होता है इन नौजवानों की समझ से बहुत दूर की बात है।यह सब मधुली आमा के पल्ले भी नही पड़ता है। आमा का एक ही रोना है कि दोनों लड़के कम्पनियों में नौकरी करते थे बड़ा लड़का जिस कम्पनी में काम करता था वह कम्पनि बन्द हो गई है। छोटा लड़का है तो नौकरी में ही पर महंगाई के हिसाब से पगार इतनी छोटी हो गई है कि उसक अपना ही खर्चा पूरा नही पड़ रहा तो आमा कौ पैसा कहां से भेजे।

आमा ने दस हजार की थोरी बेची तो थी पर महंगाई के सामने वह पैसा कहां ठहरता। आमा ने गुस्से में बोल ही दिया कि अब तो दुकान की तरफ देखने में भी डर लगने लगा है। विशन अपने खेतों में थोड़ी बहुत साक भाजी पैदा कर के नमक तेल का जुगाड़ कर ही लेता था, इधर बन्दरों की तेजी से बड़ गई संख्या के सामने वह भी हार मान गया है। बता रहा था कि पूरे चार सौ बन्दर हैं जो बारी बारी से आते हैं और जो भी हाथ लगा चैपट्ट कर जाते हैं। गोपाल बकरियां पालता है कुछ साल पहले तक जाड़ों में उसके पास बीस पच्चीस बकरियां होती ही थी इधर बाग लगा तो एक ही रात में गोपाल की पांच बकरियां मार गया। जब गोपाल ने देखा कि रोज रात में बाघ उसकी बकरियों के लिये उसके घर के द्वाब लग रहा है तो उसने भी सारी बकरियां बूचड़ को बेच दी अब दिन भर घाम में बैठ कर पत्ते खेल ले रहा है। गांव में विचित्र प्रकार की खामोशी है पर गांव अपनी जगह ही है।

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