जीवन और जीवन संघर्ष

सुरेश भाई - प्रेम पंचोली 

आजादी से पहले और बाद में ६०-७० के दशक तक उत्तराखंड हिमालय में सर्वोदय विचार के सदस्यों ने अनुसूचित जाति के लोगों के बीच जाकर उन्हें गाँव समाज के बीच समानता के अधिकार दिलाया है|

इसमें बुढाकेदारनाथ में भरपूरु नगवान जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिनपर १९ मई, २०१८ को एक किताब बिहारीलाल जी व प्रेम पंचोली के संपादन से लोकार्पण किया गया है| बुढाकेदारनाथ के उनके प्रमुख सहयोगी रहे धर्मानंद नौटियाल व बहादुर सिंह राणा ने शराबन्दी के साथ ही छुआ-अछूत निवारण जैसी कुप्रथा के खिलाफ जीवनभर लड़ते रहे हैं | इनके अलावा सूरत सिंह नेगी और परिपूर्नानंद सेमवाल का योगदान भी है| बूढ़ाकेदारनाथ में आप देखेंगे तो अभी की पीढ़ी में धीरेन्द्र नौटियाल, जय प्रकाश राणा, बावन सिंह बिष्ट, वीरेंदर नेगी आदि कई लोग भी इस कार्य में लगे हुए हैं| इनके आगे की नयी टीम में हिम्मत रौतेला, भूपेंद्र सिंह नेगी, सतीश रतुरी, जयशंकर नगवान, अव्वल छनवान, विष्णु नगवान, कौशल्य आदि हैं| यहाँ पर सामाजिक क्षेत्र में श्री बिहारी लाल जी और राजनीतिक क्षेत्र में पूर्व मंत्री श्री बलवीर सिंह नेगी का मार्गदर्शन लोगों को मिला है| इन सबको नमन है| भरपूरु नगवान जी पर लिखी पुस्तक के लोकार्पण के बाद बाकी समाज सुधारकों पर भी लिखनें का मन है|

उत्तराखंड में सर्वोदय कार्यकर्ता, डोला पालकी, मंदिर प्रवेश व भूदान-ग्रामदान आंदोलन के सशख़्त हस्ताक्षर रहे भरपुरू नागवांन पर बिहारी भाई द्वारा लिखी गयी और समय साक्ष्य से प्रकाशित किताब "जीवन और जीवन संघर्ष" का लोकार्पण बूढाकेदार स्थित लोकजीवन विकास भारती संस्था के 41वें स्थापना दिवस के अवसर पर किया गया है। इस दौरान किताब के लेखक व वरिष्ठ सर्वोदय कार्यकर्ता बिहारी भाई, टेहरी हाईड्रो डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटिड सेवा के निदेशक मोहन सिंह रावत गांववासी, पूर्व विधायक घनसाली बलबीर सिंह नेगी, पूर्व प्रमुख धनी लाल शाह, पूर्व जिला पंचायत सदस्य मुरारी लाल खंडवाल, रक्षासूत्र आंदोलन के प्रणेता सुरेश भाई, बीज बचाव आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी, किताब के संपादक प्रेम पंचोली, देवेंद्र बहुगुणा, नागेंद्र दत्त, साब सिंह सजवाण, ओमप्रकाश डंगवाल आदि सम्मलित थे। किताब में 11 अध्याय व 18 अन्य परिशिष्ट हैं। भरपुरू नागवांन द्वारा आजादी के बाद समता व समरसता के लिए जो कार्य किये गए थे उनकी गतिविधियों को इस किताब में लिखा गया है। लेखक ने बताने का प्रयास किया कि भरपुरू नागवांन की गतिविधियों से प्रभावित होकर बूढ़ाकेदार गांव में ब्राह्मण, राजपूत व अनुसूचित जाति के तीन परिवारों ने लंबे समय तक सहजीवन बिताया। यही वजह रही कि तत्काल उत्तरप्रदेश के हिमालय क्षेत्र उत्तराखंड में सभी समुदाय तब अस्प्रियशता के खिलाप लोग खड़े हुए। पुस्तक लोकार्पण के दौरान लोकजीवन विकास भारती के नई तालीम शिक्षा केन्द्र की छात्राओं ने रंगा रंग कार्यक्रम प्रस्तुत किया। वक्ताओं ने किताब को शोध का विषय बताया। कहा कि किताब इसलिए महत्वपूर्ण है कि परिवार व सामाजिक कामो में कैसे ताल मेल बनाया जाय। ऐसी सीख इस किताब से मिलती है। किताब संदेश करती है कि स्वावलंबन ही जीवन की सकारात्मक दृष्टि है। इस पुस्तक लोकार्पण व संस्था स्थापन के अवसर पर सभी कार्यकर्ताओ ने गाँधी शताब्दि वर्ष मनाने का भी निर्णय लिया है। कहा कि गांधी के 150 वर्ष पूर्ण होने पर वे रचना के कामो को विभिन्न कंपनियों के सामाजिक जिमेदारियो के बजट को गाँव गाँव मे पहुंचने के लिए अभियान चलायेंगे। ताकि यह बजट गांव में समाज विकास के काम आए।

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