नंदा की चिंता-2

महावीर सिंह जगवान 

नैना चिंतित है नंदा के परिवार की आर्थिक स्थिति को देखकर, वह कई बार नंदा से पूछने का साहस बटोरती है लेकिन फिर मौन हो जाती है.

नंदा समझ जाती है नैना कुछ बात छुपा रही है, नंदा कहती है दीदी तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही हो, बताऔ तो सही क्यों रोक रही हो, नैना कहती है नंदा मुझे चिंता है तुम नाराज तो नहीं हो जाऔगी, नंदा कहती है तुम्हें पता मै नाराज नहीं होती, दादा की सबसे निर्भीक और साहसी नातिनी हूँ। नैना सवाल करती है माँ जी सदा कहती है नंदा के दादा बहुत मेहनती ईमानदार और शिद्धांतवादी हैं साथ ही संपन्न भी लेकिन तुम्हारी माली हालात कुछ कमजोर ही प्रतीत होती है, जैसा आपने बताया दादाजी के पास अंतिम समय मे ईलाज तक के लिये धन नहीं था यह समझ नहीं आया, नंदा की आँखो से आंसुऔं की बूदें टपकने लगी वह सहसा अपने को धैर्य मे लौटाती हुई कहती है.

मेरे दादा जी उस जमाने के आठवीं पास थे, नियमित नित्य कर्म, दो वक्त की संध्या पूजा, मेहनती और न्यायप्रिय थे, साथ ही दयालु हृदय और सदैव गाँव के गरीब से लेकर पच्छियों के निवाले तक की चिंता और संभव समाधान करते थे। मैंने अपनी आँखों से देखा और सुना है दादा विलक्षणता के धनी थे वह किसी भी समस्या का चुटकी मे समाधान करते और मुँह सामने यदि उनकी बातों से कोई नाराज भी होता तो वह पीठ पीछे इतना जरूर कहता वह देवतुल्य इंशान हैं, दादा जी अपने पिता की इकलौती संतान थी इसलिये कभी भी उन्हें घर से बाहर नहीं भेजा। एक बार मेरे दादा जी और दादी जी केदारनाथ यात्रा पर गये, वहाँ बहुत भीड़ थी साथ ही कड़ाके की ठंड हल्की बर्फवारी भी हो रही थी, दादाजी ने रहने की ब्यवस्था की और दादी जी को लेकर सायंकालीन केदारनाथ जी की आरती मे चले गये, वह आरती का मातम्य पाकर लौटते हैं उन्हें एक किनारे पर ठंड से ठिठुर रहे कुछ यात्री दिखते हैं, वह उनसे कहते हैं ठंड भारी है रहने की ब्यवस्था करो अन्यथा जान को खतरा हो जायेगा, उनका काँपते हुये जबाब होता है बाबा केदार के भरोसे रात कट जायेगी, दादा जी समझ गये इनके पास रहने और खाने की ब्यवस्था लायक खर्चा नहीं है वह उन पाँच राजस्थानी श्रद्धालुऔं को अपने डेरे मे ले जाते हैं, उनको भोजन और विश्राम करवाते हैं,सुबह के तीन बज रहे हैं दादा जी और दादी जी साथ ही पांचो राजस्थानी यात्री मंदाकिनी के तट पर जाकर गंगा की पूजा और स्नान का मातम्य पाकर लौटते हैं और सीधे केदारनाथ जी के बंद कपाट के सम्मुख बैठकर ऊँ नम:शिवाय्:, जय केदारनाथ जी का जप करते हैं और पट खुलते ही उनको शुरूआत मे ही केदारनाथ जी के दुर्लभ दर्शन का सौभाग्य मिलता है

दादाजी और दादी जी के साथ पाँच राजस्थानी यात्री भी हैं, दादा जी घर से लाये दूध घी दही मक्खन को केदार लिंग पर मलते हैं और फूट फूट कर रोने लगते हैं दादी जी कहती है जीवन मे एक ही बार तुम्हारे दादा के आँखों मे आँसू आये थे वह भी केदानाथ जी के पास, दादा जी के आंसू गिरते ही दादा खुद को फूल जैसे हल्का समझने लगे, मानो सदियों का बोझ केदार बाबा ने अपने पास ले लिया हो, समय पर दर्शन पूजा कर वापसी की तैयारी की तो जो साथ मे रात से राजस्थानी तीर्थ यात्री थे वह पैदल चलने मे असमर्थ थे, इसलिये दादा जी निर्णय लिया एक दिन और केदार पुरी मे ही रूका जाय, पाँचो यात्रीगणो को भोजन करवाकर विश्राम करने को कहा और स्वयं दादी जी को साथ लेकर पहले भैरवनाथ जी की पूजा की तत्पश्चात शंकराचार्य जी की समाधि स्थल के समीप ध्यान मे बैठे, फिर केदारनाथ जी के पृष्ठ भाग से होकर उबलते सागर के दर्शन किये, दादी जी कहती हैं तेरे दादा उसी समय कह गये थे केदार पुरी के शीष पर यह उबलता सागर एक दिन केदार पुरी के लिये संकट बनेगा, वहाँ से चौराबाड़ी ताल होते हुये लौटे और कमरे पर आये, वहाँ विश्राम कर रहे राजस्थानी यात्री गणो से हाल चाल पूछा, उनको भोजन करवाया और सुबह जल्दी उठने की बात कह जय केदार बोलते हुये आराम से सो गये और सुबह उठकर केदार बाबा के दरवाजे पर माथा टेककर वापसी की पैदल यात्रा शुरू कर दी, अब दादा दादी के साथ पाँच यात्री भी थे, देर रात को अपने गाँव पहुँचे और उन राजस्थानी यात्रीगणो को भी एक दिन अपने घर मे ठहराकर खूब आतिथ्य सत्तकार किया, फिर रास्ते भर के लिये घीं मे बनी पूरी, गुड़, भुने हुये काले और सफेद सोयाबीन तिल के साथ संभव खर्चा देकर दूर तक विदा किया, विदायी का पल बड़ा भावुक था, सभी राजस्थानी तीर्थ यात्री साठ वर्ष से ऊपर के थे, वो कहते हैं, केदारनाथ जी की यात्रा से जो हमे पुण्य मिला है वह हम आपको दे देते हैं इसके शिवा और कुछ भी आपको देने के लिये नहीं, दादा जी का जबाब था, जीवन बहुत छोटा है मैं अपने पित्रों माता पिता अपने कर्मों के पुण्य से संतुष्ट हूँ, मेरे लिये आप पाँच पाण्डव तुल्य देवताऔं की सेवा का सौभाग्य मिला जो सदैव अविस्मरणीय रहेगा, और तीर्थ यात्रियों का समर्पण युक्त प्रणाम आप हमारे लिये साक्षात केदारनाथ जी हैं, हमारा सौभाग्य है शिव सदृश ब्यक्तित्व का साथ मिला नमन करते हुये वह आगे बढे और दादाजी घर की ओर लौट आये।

दादा जी जब घर लौटे उसी रात उन्हें सपने मे बाबा केदारनाथ जी ने दर्शन दिये, बाबा केदारनाथ जी ने कहा मै तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हूँ कहो आपको क्या वरदान चाहिये, दादा जी को इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती थी, दादा जी ने कहा मेरे अराध्य मुझे ऐसी सेवा का सदैव मौका मिले जिससे मेरे शंकर प्रसन्न होते हों, बाबा केदारनाथ अति प्रसन्न हुये और कहा मेरा और तेरा आज से अटूट संबंध हो गया, जब भी मेरी जरूरत हो मुझे याद करना। दादा जी को बस यही रहता था जब भी बाबा केदारनाथ के पट खुलें वह सेवा और दान हेतु केदारपुरी पहुँच जाते। धीरे धीरे उन्होंने वहाँ पर ब्यवसाय शुरू कर दिया, लाभ के धन का एक हिस्सा परिवार के लिये और दूसरा हिस्सा जरूरत मंदों की सेवा मे लगा देते थे, यह सिल सिला चलता रहा, गाँव के कई बेरोजगारों का सहारा बनकर उन्हे सबल करने मे बहुत मंथन और सहयोग करते थे, जो भी दादा जी को जानता था यदि कोई परेशानी होती तो अंतिम सहारा दादा जी ही होते थे, उनके सहयोग से आज कई लोग ऊँचे ऊँचे पदों पर और सम्मपन्नता से जी रहे हैं यही दादा जी की असल कमाई है, सब कुछ ठीक ही चल रहा था, 2013 की केदारनाथ आपदा मे दादा आर्थिक रूप अनाथ हो गये थे, उनकी संपूर्ण पूँजी नष्ट हो गई थी, जिनसे उनका ब्यापार ब्यवसाय उधारी चलती थी उनमे से अधिकतर केदार त्रासदी मे जान गवाँ चुके थे, दादा जी भी छ:दिन बाद बहुत बुरी स्थिति मे घर लौटे थे, आपदा के बाद केदार घाटी चील और गिद्धों की तरह नेताऔं, उनके चमचों और डकैत ब्यौरोक्रेट्स फर्जी दान धर्म करने वालों से भर चुकी थी, हाँ कुछ प्रतिशत देव तुल्य भी थे लेकिन शंख्या बल लुटेरों का बड़ा था, मौत और तबाही पर घूब लूट खसोट हुई, नेता पंछियों की तरह हवा मे उड़ते थे, उन पर पलने वाले परजीवी नीचे कफन नोच रहे थे, एक परजीवी दूसरे परजीवी का पोषण करता था, जो सम्मपन्न और सुरक्षित थे वो भी आपदा की परिणति बहने वाली भ्रष्टाचार की मायावी नदी मे खूब बाल्टी भर रहे थे, दादा जी को किसी ने नहीं पूछा और न ही दादा जी ने किसी को अपनी बात कही, बस दादा जी कहते थे बाबा केदार की यही इच्छा थी, इसे सहजता से स्वीकार करना पड़ेगा, कुछ ही दिनों बाद भारी वर्षा हुई, जो हमारा सबसे बड़ा सेरा (सिंचित खेत) वह बह गया, भारी भूस्खलन से गौशाला टूट गई उसमे बंधी तीन भैंसे और एक गाय दबकर मर गई फिर क्या था दादा की मेहनत पूर्वजों की भूमि सब कुछ खो चुके थे दादा जी, फिर भी दादा जी कहते थे इंशान नंगी धरती मे आता है कुछ न होकर भी वह सबकुछ प्राप्त कर देता है, समय से भिड़ना नही चाहिये, संयम और धैर्य से फिर शुरूआत करनी चाहिये, समय कभी खराब और कभी बढिया यह तो सृष्टि का नियम है, विपत्ति मे अपने कुटुम्ब के करीब रहकर अधिक से अधिक स्नैह का वातावरण निर्मित करना चाहिये, ताकि फिर अच्छी शुरूआत के लिये सहज वातावरण बन सके।

नंदा कहती है इन विपत्तियों का दादा पर एक ही फर्क पड़ा वह घर से बाहर जाना छोड़ चुके थे, इसके दो कारण कहते थे पहला मै एक एक पल अपने परिवार के संग ब्यय करना चाहता हूँ, दादा जी घर मे इतना सुंदर वातावरण बनाया था हम आज भी इतनी प्रसन्नता संतोष और सुकून से रहते हैं यह सब दादाजी का दिया अनमोल तोहफा है, घर से बाहर न जाने का दूसरा बड़ा कारण था वह किसी को भूखा और असहाय नहीं देख सकते थे, उनकी आदत मे सेवा दया और दान का समावेश था, अब वह यह सब करने मे असमर्थ थे, इसलिये भी घर से बाहर जाना छोड़ दिया था। नैना यह सब सुनकर अवाक स्तब्ध थी, वह इस बात को भली प्रकार समझ गई नंदा के दादा संपन्नता से कैसे अभाव मे घिर गये, वह बड़ी उत्सुकता से कहती है सरकारें आपदा के नाम पर भूस्खलन के नाम पर बड़ी बड़ी सहायता देते हैं लेकिन नंदा क्या उत्तराखंड की सरकार को यह तक पता नहीं एक सम्मपन्न कौशल से युक्त मेहनती ब्यक्ति इसलिये अभाव और संकट की गिरफ्त मे आ गया क्योंकि उसे पहाड़ से प्रकृति से और अपनो से इतनी मौहब्बत थी उसने पलायन की अपेक्षा हिमालय से सटे पहाड़ी ढलान पर कुदरती गुलदस्ते सदृश सजे गाँव को ही बिलायत बनाने की ठानी थी, आपके दादा जी का इतना बड़ा नुकसान हो गया और सरकारों को कोई चिंता नहीं.

नंदा की कोमल आँख से फिर मोती की बूँदू सदृश आसूं टपकते हैं, इन आसुंऔं के धरा पर पड़ते ही धरा भी द्रवित होती है, फिर नंदा कहती है पहाड़ का आदमी जो भी प्राप्त करता है वह खून पशीने की मेहनत से ही संभव है, जो भी उसके साथ दुर्भाग्य से घटित होता है उसे वह भाग्य पर लिखा मानकर स्वीकार करता है, दादा जी कहते थे अब अपना उत्तराखंड बन गया अब मेहनत और भाग्य के बीच सरकार का साथ भी होगा, सरकारें भी परिवार के अभिवाहक के सदृश ही होती हैं, जनता की कठिनाइयों विपत्तियों मे सरकारों की स्वाभाविक कोशिष होनी चाहिये नागरिक सुरक्षित रहे, उसे संभलने का अवसर मिले, उसे भीख नहीं चाहिये उसे वातावरण चाहिये ताकि उसके श्रम का लाभ मिले, यदि उसके खेत बह चुके हैं तो उसे खेती लायक जमीन चाहिये, यदि उसका घर आँगन गौसाला भूस्खलन मे स्वाहा हुई तो उसे छत चाहिये, खासकर पहाड़ पर जीवन ब्यतीत करने वाला यदि जोखिम लेकर मातृ भूमि और सीमान्त भू क्षेत्र को आबाद किये है तो उसे वह सभी सुविधायें चाहिये जिस पर अधिकार है एक नागरिक होने के नाते। नंदा कहती है दीदी नैना दादा जी बहुत दु:खी होते और कहते थे उत्तराखंड मे नेताऔं की आपस मे बहुत लड़ाई है सबको मुख्यमंत्री बनने की भूख है, गाँव के गाँव भूस्खलन के कारण मौत के मुहाने पर बैठे हैं लेकिन सरकारों को कोई चिंता नहीं, बाढ आपदा से लाखों भूमिहीन हो गये उनकी कोई चिंता नहीं। जिन्हें भाग्यविधाता मानकर जनता चुनती है वह अपना बैंक बैलेंस और कोठी का साइज बढाकर लापता हो जाते हैं, किसे चिंता पहाड़ के मानव की।

नैना भावुक होकर कहती है नंदा तेरे दादा जी दुनिया के सबसे बड़े धनी और विद्वान थे मै उन्हें नमन करती हूँ, काश औरों के दादा की तरह वह भी पहाड़ से कम मुहब्बत करते और थोड़ा लालची टाइप के होते तो आज हल्द्वानी रामनगर या देहरादून के धन्ना सेठ और बड़े नेता होते समय पर पलायन कर देते। मुझे तो लगता है इतना सम्मपन्न तो उस जमाने मे कोई भी न था। नंदा कहती है ऐसा मत बोल सब यही सोचते तो यहाँ वीरान हो जाता फिर यहाँ के देवी देवता भी विलुप्त होते, पीढियों से समृद्ध संस्कृति बोली भाषा सब कुछ खो देते हम लोग। और नैना फिर जोर से कहती है काश सरकारें भी इतनी गंभीर होती। नंदा कहती है दादा जी कहते एक बड़ा बदलाव आयेगा जब सब ठीक होगा, नैना कहती है कुछ भी बोल नंदा सरकारें तो पहाड़ियों के उजड़ने की प्रतीक्षा मे हैं, नंदा फिर कहती जब तक मेरे दादा जी जैसे अनगिनत पहाड़ी और उनकी संताने पहाड़ों पर हैं तब तक कुदरत उन्हें मात नहीं दे सकी, सरकारें तो पहले से गैरजिम्मेदार रही हैं, हमारे मौन और धैर्य की परीक्षा ले रही हैं सरकारें।

नैना ने पहली बार पहाड़ियों की हिम्मत और जज्बै को नजदीकी से सुना और कहा नंदा हम भले मैदान में सुरक्षित और संम्मपन्न दिखते हों लेकिन हम खोखले और असुरक्षित हो गये, हम तो भीड़ के हिस्से हैं सौ गज जमीन पर रेंगने वाले प्राणी बन गये। नंदा को आज संतुष्टि है क्योंकि नैना कल तक मान रही थी उसके दादा और पहाड़ी गरीब होते हैं और लाचार होते हैं आज उसके दिल मे दादा जी के प्रति अगाध श्रद्धा और सम्मान था, वह मैदान की अपेक्षा पहाड़ मे अधिक सुकून और प्रेरणादायी मान रही थी। नंदा इतना तो समझ रही है सरकारों का ध्यान मैदान पर ही है पहाड़ की चिंता तो दिखावट ही है।

नंदा की चिंता -2 क्रमश: जारी

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