कविताओं के लिए एकजुट  

भास्कर उप्रेती 

हल्द्वानी में इस माह 'क से कविता' का आयोजन जगदीश जोशी जी (मास्साब) के घर में हुआ.

भगवानपुर रोड, ब्लॉक स्थित उनके घर की गुनगुनी छत इस यात्रा का एक और मुकाम बना. जाड़ों की गुनगुनी धूप में छत पर चाय और रोस्टेड आलू का मजा हो तो कविता की जरूरत ही क्या है! तो खैर इस माहौल में कविता ने धीरे-धीरे बोलने की कोशिश की और अंततः कविता धूप पर हावी हो गयी. शुरुआत डॉ. सुरेश भट्ट जी के सुमधुर मगर चेतन गीत से हुई. फिर जगमोहन रौतेला, पूरन बिष्ट, हर्षिता, प्रो. प्रभात उप्रेती, जगदीश जोशी, डॉ. निर्मल नियोलिया, प्रो. भूपेन सिंह, हरीश पंत, सुनीता, भास्कर, योगेश भगत आदि ने अपनी कविताएँ पेश कीं. 

इस बार के आयोजन में कई पुराने और जरूरी साथी नहीं जुड़ सके. उनका खास अफ़सोस ये था कि ये आयोजन जगदीश मास्साब के घर हो रहा है और वो आ नहीं पा रहे हैं. मगर, कुछ नए साथी भी जुड़े जैसे निर्मल नियोलिया और योगेश भगत. निर्मल दा खटीमा में शिक्षक हैं और योगेश दा बाजपुर में. सो, उम्मीद की जा सकती है कविता के छीटे हल्द्वानी मंडी से बाहर भी जायेंगे. हर बार की तरह जगदीश मास्साब ने ही कविता की पोथी से दुर्लभ कविता निकाली. ये कविता 1981 में प्रकाशित हुई थी और अनुमान था कि 1975 के आस-पास लिखी गयी होगी - चारु चंद्र पाण्डे की कविता. प्रकृति, जीवन, सौंदर्य का अद्भुत समिश्रण. इस कविता का फोटो स्टेट पाने के लिए बाद में हरीश पंत मास्साब को लेकर पैदल ही फोटो स्टेट की दुकान ढूंढते पाए गए. यानी कविता काम करती है. 

हरीश पंत जी यानी हरदा ने खुद अशोक पाण्डे यानी अशोक दा की दो उम्दा कविताएं पेश कीं. अशोक दा यूँ तो हमारे ही बीच और इसी शहर में दुर्लभ हैं, लेकिन उनकी कविताएँ पुरानी जिल्द में लिपटी थी. ये भी बड़ी उम्दा कविताएँ साबित हुई. अशोक दा के नैनीताल के दिनों यानी छात्र दिवसों की कवितायें थीं ये, मगर पक्का दीर्घजीवी. प्रभात जी ने लोकेश डसीला की 'उत्तर पूर्व का बुरांश' कविता सुनाई. ये देखना बड़ा अच्छा था कि एक गुरु अपने छात्र की कविता सुनाये. दुर्लभ क्षण ही होता है भारतीय ज्ञान परंपरा में. लोकेश भाई इन दिनों पिथौरागढ़ के एक स्कूल में पढ़ाते हैं. उनकी छात्र जीवन की छवि एक वनस्पति विज्ञानी की है. गाइड द्वारा उनके शोध को खुद के नाम से छपवा लेने के बाद वह खिन्न होकर लखनऊ छोड़ आए थे. मगर, नींबू प्रजातियों के वानस्पतिक गुणों को जानना हो तो वे शानदार ज्ञानी पुरुष हैं. पूरन दा द्वारा सुनाई गयी कविता छोटी मगर छाप छोड़ने वाली थी. 

निर्मल दा की कविता ग्वाटेमाला से चलकर आई थी और बुद्धिजीवियों पर एक करारा प्रहार थी. हम कविताप्रेमी लोग मीडियाप्रेमी नहीं हैं, फिर भी हमारे हरदिलअजीज छायाकार दीप बिष्ट बाबा सूँघते-सुँघाते नगर ने खूब दूर मास्साब की छत तक आ ही गए. हमारी इच्छा तो इस बार उनसे उनके फनकार से मिलने की थी, मगर वो क्याप्प करके शरमा दिए. हर्षिता ने शानदार लहजे में बाल कविता पेश की. जिन और साथियों ने इस बार के आयोजन में शिरकत की उनमें पुराने संग्रामी यतीश पंत, सुरेश उप्रेती, जयप्रकाश पांडे, हिमानी त्रिपाठी आदि शामिल थे. इस बार यात्रा ने भी 'क से कविता' की छत में कदम रखे, मगर कविता में डूबे लोगों को डिस्टर्ब करने के लिए. उसने कविता सुनाने से साफ़ इंकार कर दिया. उसके लिए धूप, तरह-तरह के चेहरे और प्रभात सर की जेब में नमकीन भरना ही सच्ची कविता था. समूह में अंत: में यह शुभ सूचना दी गयी कि 'क से कविता' का प्रदेश सम्मेलन अप्रैल 14 को नैनीताल में होना तय हुआ है. उसको सफल बनाने और सुकार्थ करने का बड़ा जिम्मा हल्द्वानी और नैनीताल के कविताप्रेमियों के ही जिम्मे आएगा. साथियों ने तिथियों को थोड़ा लचर रखने का सुझाव दिया, क्यूंकि इसी बीच स्कूल के मूल्यांकन का काम चल रहा होगा.

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